
सनातन धर्म में मानव जीवन के कल्याण के लिए अनेक व्रत-विधान बताए गए हैं। इनमें अनेक व्रत स्त्रियों के लिए नियत है। उन व्रतों के पालन के लिए धार्मिक नियम-संयम और पवित्र आचरण का महत्व बताया गया है। किंतु प्राकृतिक रुप से स्त्रियों के लिए कुछ स्थितियों ऐसी आती है। जिनके कारण व्रत पालन की निरंतरता में बाधा आती है। इनमें से एक कारण है - स्त्री का रजस्वला होना यानि मासिक चक्र।
मासिक या किसी विशेष व्रत के संकल्प के दौरान मासिक चक्र आने पर व्रत को लेकर हर स्त्री के मन में शंका, संशय और व्रत भंग होने के कारण धर्म दोष की पीड़ा रहती है। इन व्रतों में मुख्यत: प्रतिमाह आने वाले एकादशी, संकष्टी चतुर्थी, प्रदोष व्रत आदि हैं। यह धर्मसंकट उस समय ज्यादा पीड़ादायक होता है। जब महिलाएं विशेष कामनाओं की प्राप्ति के लिए सोलह सोमवार या सोलह शुक्रवार के व्रत रखती है। शास्त्रों में व्यावहारिक रुप से इसका उपाय भी बताया गया है-
मासिक च्रक के दौरान व्रत पालन को लेकर संशय दूर करने के लिए सबसे पहली बात है कि व्रत संख्या में उस दिन को न गिना जाए। इस दौरान व्रत रखें। किंतु यह भी जरुरी है कि किसी भी तरह से भगवान की उपासना और देव पूजा में शामिल न होवें। यही नियम मासिक और सोलह सोमवार आदि संकल्प व्रतों में व्यवहार में अपनाए। इससे व्रत भंग का दोष नहीं लगता और व्रत धर्म का पालन भी हो जाता है।
ऐसा करने पर मात्र व्रत की अवधि बढ़ जाती है। जैसे अगर आपने १६ सोमवार का व्रत लिया है तो १६ सप्ताह के स्थान पर मासिक चक्र के दिन आए सोमवार को न गिनने से यह व्रत अवधि १७ वें सप्ताह के सोमवार पर पूरी होती है।
दूसरा संशय यह कि अगर व्रत के दिन ही स्त्री रजस्वला हो जाए। तब क्या करें। तब भी ऊपर लिखी बात का ही पालन करें यानि मासिक चक्र आते ही देवकार्य और पूजा से अलग हो जाएं, किंतु व्रत रख सकते हैं।

हर स्त्री के लिए मातृत्व सुख संसार का सबसे अहम सुख माना जाता है। जीवन में हर स्त्री बेटी, बहन, बहू के रुप में परिवार में अलग-अलग रिश्तों को निभाती है। लेकिन स्त्री माँ बनने के बाद ही एक संपूर्ण स्त्री होने का एहसास पाती है। वह मॉं होने का ऊंचा दर्जा पाती है, जिसे प्रकृति और ईश्वर द्वारा उसे ही दिया गया है। यह उसके जीवन का कभी न भूलने वाला सुखद समय होता है।
मनुष्य जीवन में कामनाओं का कोई अंत नहीं है। एक कामना पूरी होते ही अन्य कोई कामना पैदा होती है। किंतु मनुष्य जीवन में कुछ कामनाएं ऐसी है, जिनका संबंध मात्र व्यक्ति विशेष से नहीं होता, बल्कि इसका संबंध ब्रह्म के द्वारा रची गई सृष्टि संचालन की महत्वपूर्ण सृजन क्रिया से है। इस कामना की पूर्ति गृहस्थ जीवन के सुखद क्षणों और स्मृतियों में शामिल होती है। यह है पुत्र प्राप्ति की कामना । हिन्दू धर्म शास्त्रों में गृहस्थ जीवन में ऐसी ही सुखद कामनाओं की पूर्ति के लिए व्रत विशेष का विधान हैं। उन्हीं में से एक है - पुत्र प्राप्ति व्रत। १८ मई पंचमी तिथि को या १९ मई से षष्ठी तिथि से यह व्रत प्रारंभ किया जा सकता है।
हिन्दू धर्म में मंगल ग्रह को अंगारक, भौम, कुजा नाम से भी जाना जाता है। मंगल ग्रह को भूमि पुत्र कहा गया है। भारतीय ज्योतिष विज्ञान में मंगल ग्रह को उदारता, पराक्रम और पवित्रता का देव माना गया है। मंगल देव का वास मंगल लोक माना गया है। इसलिए इनको मंगलवार का स्वामी भी कहा गया है।