Thursday, July 29, 2010

माहवारी में कैसे करें व्रत पालन

सनातन धर्म में मानव जीवन के कल्याण के लिए अनेक व्रत-विधान बताए गए हैं। इनमें अनेक व्रत स्त्रियों के लिए नियत है। उन व्रतों के पालन के लिए धार्मिक नियम-संयम और पवित्र आचरण का महत्व बताया गया है। किंतु प्राकृतिक रुप से स्त्रियों के लिए कुछ स्थितियों ऐसी आती है। जिनके कारण व्रत पालन की निरंतरता में बाधा आती है। इनमें से एक कारण है - स्त्री का रजस्वला होना यानि मासिक चक्र।



मासिक या किसी विशेष व्रत के संकल्प के दौरान मासिक चक्र आने पर व्रत को लेकर हर स्त्री के मन में शंका, संशय और व्रत भंग होने के कारण धर्म दोष की पीड़ा रहती है। इन व्रतों में मुख्यत: प्रतिमाह आने वाले एकादशी, संकष्टी चतुर्थी, प्रदोष व्रत आदि हैं। यह धर्मसंकट उस समय ज्यादा पीड़ादायक होता है। जब महिलाएं विशेष कामनाओं की प्राप्ति के लिए सोलह सोमवार या सोलह शुक्रवार के व्रत रखती है। शास्त्रों में व्यावहारिक रुप से इसका उपाय भी बताया गया है-



मासिक च्रक के दौरान व्रत पालन को लेकर संशय दूर करने के लिए सबसे पहली बात है कि व्रत संख्या में उस दिन को न गिना जाए। इस दौरान व्रत रखें। किंतु यह भी जरुरी है कि किसी भी तरह से भगवान की उपासना और देव पूजा में शामिल न होवें। यही नियम मासिक और सोलह सोमवार आदि संकल्प व्रतों में व्यवहार में अपनाए। इससे व्रत भंग का दोष नहीं लगता और व्रत धर्म का पालन भी हो जाता है।



ऐसा करने पर मात्र व्रत की अवधि बढ़ जाती है। जैसे अगर आपने १६ सोमवार का व्रत लिया है तो १६ सप्ताह के स्थान पर मासिक चक्र के दिन आए सोमवार को न गिनने से यह व्रत अवधि १७ वें सप्ताह के सोमवार पर पूरी होती है।



दूसरा संशय यह कि अगर व्रत के दिन ही स्त्री रजस्वला हो जाए। तब क्या करें। तब भी ऊपर लिखी बात का ही पालन करें यानि मासिक चक्र आते ही देवकार्य और पूजा से अलग हो जाएं, किंतु व्रत रख सकते हैं।

प्रसव पीड़ा कम करे - प्रसव पीड़ाहर व्रत

हर स्त्री के लिए मातृत्व सुख संसार का सबसे अहम सुख माना जाता है। जीवन में हर स्त्री बेटी, बहन, बहू के रुप में परिवार में अलग-अलग रिश्तों को निभाती है। लेकिन स्त्री माँ बनने के बाद ही एक संपूर्ण स्त्री होने का एहसास पाती है। वह मॉं होने का ऊंचा दर्जा पाती है, जिसे प्रकृति और ईश्वर द्वारा उसे ही दिया गया है। यह उसके जीवन का कभी न भूलने वाला सुखद समय होता है।
इसके दूसरे पहलू पर विचार करें तो यह किसी भी स्त्री के लिए शारीरिक और व्यावहारिक रुप से पीड़ा का समय होता है। जिसे प्रसव पीड़ा भी कहते हैं। यह स्त्री के लिए एक कठिन और जोखिम भरा क्षण भी होता है। इससे गुजरकर और सहन कर वह स्वयं के साथ परिवार को खुशियां देती है। इसलिए वह जननी और शक्ति के रुप में जानी जाती है।
प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अपने ज्ञान और दूरदर्शिता से मानव जीवन से जुड़ी हर पीड़ा को समझकर उससे निजात पाने के उपाय बताए हैं। धर्म ग्रंथों में यह उपाय व्रत उपवास के रुप में बताए गए हैं। धर्म और ईश्वर में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति इनके पालन से कष्टों और पीड़ाओं से मुक्त होकर सुफल पाता है।
स्त्री के गर्भधारण से लेकर प्रसूति तक अनेक सावधानियां, चिकित्सीय उपाय अपनाए जाते हैं। जिससे सुरक्षित प्रसव हो और संतान प्राप्ति के रुप में मनोवांछित और सुखद फल मिले। धर्मग्रंथों में भी इसी भावनाओं को समझकर प्रसव पीड़ा हर व्रत के पालन के रुप में एक सरल प्रयोग बताया गया है, जो न केवल गर्भवती की प्रसव पीड़ा को कम करेगा बल्कि उसे निर्भय और मानसिक रुप से सबल बनाता है। जानते हैं इसकी विधि
- प्रसव की तारीख और समय नजदीक आने पर लगभग पांच या सात दिन पूर्व से गर्भवती की माँ या सास या देखरेख करने वाली निकट संबंधी व्रत रखे। हर दिन पलाश के पत्तों के दोने या कटोरी में तिल का तेल भरें। उसमें २१ स्वच्छ और पवित्र दुर्वा लेकर तेल में धीरे-धीरे घुमावे। हर बार दुर्वांकुर घुमाने पर यह मंत्र बोलें -
हिमवत्युत्तरे पार्श्र्वे शबरी नाम यक्षिणी ।
तस्या नूपुरशब्देन विशल्या स्यात्तु गर्भिणी ।।
इक्कीस बार इस मंत्र का जप हो जाने पर दोने में से थोडा-सा तेल गर्भवती को पिला दें। सहयोगी व्रती स्त्री इस मंत्र का प्रसूति के दौरान जाप करती रहे। ऐसे व्रत पालन से प्रसव और गर्भावस्था की पीड़ा कम होती है। साथ ही सुरक्षित और सुखद प्रसव होता है।

पुत्र जन्म की कामना पूरी करे - पुत्र प्राप्ति व्रत

bala_310मनुष्य जीवन में कामनाओं का कोई अंत नहीं है। एक कामना पूरी होते ही अन्य कोई कामना पैदा होती है। किंतु मनुष्य जीवन में कुछ कामनाएं ऐसी है, जिनका संबंध मात्र व्यक्ति विशेष से नहीं होता, बल्कि इसका संबंध ब्रह्म के द्वारा रची गई सृष्टि संचालन की महत्वपूर्ण सृजन क्रिया से है। इस कामना की पूर्ति गृहस्थ जीवन के सुखद क्षणों और स्मृतियों में शामिल होती है। यह है पुत्र प्राप्ति की कामना । हिन्दू धर्म शास्त्रों में गृहस्थ जीवन में ऐसी ही सुखद कामनाओं की पूर्ति के लिए व्रत विशेष का विधान हैं। उन्हीं में से एक है - पुत्र प्राप्ति व्रत। १८ मई पंचमी तिथि को या १९ मई से षष्ठी तिथि से यह व्रत प्रारंभ किया जा सकता है।

यह व्रत वैशाख शुक्ल षष्ठी को रखा जाता है और एक वर्ष पर्यंन्त तक करने का विधान है। यह तिथि व्रत है। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव के द्वारा बताया गया है। पुत्र प्राप्ति की कामना करने वाले दंपत्ति के लिए इस व्रत का विधान है। इस व्रत में स्कन्द या कार्तिकेय स्वामी की पूजा और आराधना की जाती है। कार्तिकेय स्वामी शिव पुत्र होकर पूजनीय देवता हैं। पुराणों के अनुसार षष्ठी तिथि को कार्तिकेय स्वामी का जन्म हुआ था। संसार को प्रताडित करने वाले तारकासुर के वध के लिए देव सेना का प्रधान बनने के लिए ही उनका जन्म हुआ था। इसलिए उनकी यह प्रिय तिथि है। वह ब्रह्मचारी रहने के कारण कुमार कहलाते हैं। योग मार्ग की साधना में कातिके य स्वामी पावन बल के प्रतीक हैं। तप और ब्रह्मचर्य के पालन से जिस बल या वीर्य की रक्षा होती है, वही स्कन्द या कुमार माने जाते हैं। इस दृष्टि से स्कन्द संयम और शक्ति के देवता है। शक्ति और संयम से ही कामनाओं की पूर्ति में निर्विघ्न होती है। इसलिए इस दिन स्कन्द की पूजा का विशेष महत्व है।

व्रत विधान के अनुसार पंचमी से युक्त षष्टी तिथि को व्रत के श्रेष्ठ मानी जाती है। व्रती को वैशाख शुक्ल पंचमी से ही उपवास करना आरंभ करे। वैशाख शुक्ल षष्ठी को भी उपवास रखते हुए स्कन्द भगवान की पूजा की जाती है। दक्षिण दिशा में मुंह रखकर भगवान को अघ्र्य देकर दही, घी, जल सहित अन्य उपचार मंत्रों के द्वारा पूजा करनी चाहिए। साथ ही वस्त्र और श्रृंगार सामग्रियां जैसे तांबे का चूड़ा आदि समर्पित करना चाहिए। दीप प्रज्जवलित कर आरती करना चाहिए। स्कन्द के चार रुप हैं - स्कन्द, कुमार, विशाख और गुह। इन नामों का ध्यान कर उपासना करना चाहिए। व्रत के दिन यथा संभव फलाहार करना चाहिए। व्रती के लिए तेल का सेवन निषेध है।

इस व्रत को श्रद्धा और आस्था के साथ वर्ष पर्यन्त करने पर पुत्र की कामना करने वाले को पुत्र प्राप्ति होती है। साथ ही संतान निरोग रहती है। यदि व्रती शुक्ल पक्ष की षष्ठी पर व्रत पालन करता है तो स्वास्थ्य का इच्छुक निरोग हो जाता है। धन क ी कामना करने वाला धनी हो जाता है।

विवाह और शरीर बाधा दूर करे - मंगलवार व्रत

हिन्दू धर्म में मंगल ग्रह को अंगारक, भौम, कुजा नाम से भी जाना जाता है। मंगल ग्रह को भूमि पुत्र कहा गया है। भारतीय ज्योतिष विज्ञान में मंगल ग्रह को उदारता, पराक्रम और पवित्रता का देव माना गया है। मंगल देव का वास मंगल लोक माना गया है। इसलिए इनको मंगलवार का स्वामी भी कहा गया है।
व्यक्ति की जन्म कुण्डली में मंगल ग्रह दोष की शांति के लिए मंगलवार व्रत का महत्व बताया गया है।
इसकी अनुकूल दशा व्यक्ति को विवाह सुख, संतान सुख, सम्मान देने के साथ ऋण और खून में आए दोषों से मुक्ति देती है। वहीं बुरी दशा में व्यक्ति खून, नेत्र, गले के रोग से ग्रसित हो जाता है। पति-पति के लिए भी जीवन के लिए घातक और मारक हो सकता है।
अत: मंगल दोष के लिए की शांति के लिए किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार को व्रत शुरु करना चाहिए। इस दिन स्वाति नक्षत्र का योग हो तो वह शुभ माना जाता है।
इस व्रत में मंगल ग्रह की मूर्ति की पूजा और आराधना की जाती है। इस व्रत के पूजा और अनुष्ठान किसी विद्वान ब्राह्मण से कराया जाना विशेष फल देने वाला होता है। मंगलवार के यह व्रत ४५ या २१ व्रत करने का विधान है। इसके बाद इस व्रत का उद्यापन किया जाता है। यह व्रत स्त्री और पुरुष दोनों द्वारा रखा जा सकता है।
पूजा विधान में लाल रंग की वस्तु और सामग्रियों के चढ़ावे और दान का महत्व है। क्योंकि मंगल ग्रह को रक्तवर्णी माना गया है। व्रत में एक भुक्त यानि एक बार रात्रि में ही भोजन किया जाता है। शास्त्रोक्त नियम, संयम, श्रद्धा और आस्था मंगल देव की पूजा और व्रत कुण्डली और जीवन के सभी बुरे योग और दोष मिट जाते हैं।
यह व्रत विशेष रुप से कुंवारी कन्याओं और विवाहित महिलाओं के लिए विशेष फलदायी होता है। कन्याएं जहां सुयोग्य वर पाती हैं, वहीं विवाहिता अखण्ड सौभाग्य और सुख पाती हैं। इसी प्रकार पुरुषों के लिए भी सभी शारीरिक, मानसिक बाधाएं दूर होती है। ऋणों से छुटकारा मिलता है, सुख, शांति, सौभाग्य और संतान सुख मिलता है।